
विकास की वजह से कटते जा रहे पेड़,
खेत भी तो घट रहे खत्म हो रहे मेड़।
खत्म हो रहे मेड़ छलनी हुई प्यारी धरा,
नव पीढ़ी क्या पायेगी दुनिया को हरा भरा।
सजा रहा है मनुज लकड़ी से दरबार,
सहमे – सहमे से है खड़े पेड़ मेरे करतार।
पेड़ मेरे करतार बेचारे पड़े हुए हैं मौन,
उनकी इस दशा को सुधारेगा अब कौन।
पर्यावरण दिवस पर याद आते अब वृक्ष,
चिंतन करते नेता है वातानुकूलित कक्ष।
वातानुकूलित कक्ष से जारी होते संदेश,
पौधारोपण कर नेता जी चले गये विदेश।
पर्यावरण का मित्रों पूछों अब न हाल,
प्रकृति ने भी सारी बदल दी अपनी चाल।
बदल दी अपनी चाल कवि मन हुआ बेचैन।
पौधारोपण मिलकर करे तभी मिलेगा चैन।
कवि संगम त्रिपाठी
जबलपुर मध्यप्रदेश












