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अब भी निकलता है क्या चाँद?

अब भी निकलता है क्या चाँद? तारों को देखे सदियाँ बीत गईं।

आसमान अब दिखता ही नहीं, लगता है उसे किसी काली साया ने निगल लिया है। या फिर धुएँ की मोटी चादर ने उसकी नीली मुस्कान छीन ली है।

शायद चाँद आज भी निकलता होगा, तारे आज भी अपनी पूरी चमक से जगमगाते होंगे, पर हमारी नज़रों तक उनकी रोशनी पहुँच नहीं पाती।

दोष आसमान का नहीं, दोष हमारी बनाई उस दुनिया का है, जहाँ धुआँ बढ़ता गया और उजाला पीछे छूटता गया।

कभी हम चाँद को निहारा करते थे, कभी तारों से बातें किया करते थे। आज इमारतें ऊँची हो गई हैं, पर हमारी नज़रें छोटी।

इंसान पता नहीं और क्या-क्या छीन लेगा— नदियों की निर्मलता, पेड़ों की हरियाली, हवाओं की ताज़गी, पक्षियों की चहचहाहट, और शायद आने वाली पीढ़ियों से तारों भरा आसमान भी।

डर बस इतना है— कहीं आने वाले समय में कोई बच्चा पूछ बैठे—

“क्या सचमुच चाँद इतना सुंदर होता था? क्या रात में इतने सारे तारे दिखाई देते थे?”

और हमारे पास… खामोशी के सिवा कोई जवाब न बचे।

आइए, विकास करें—लेकिन ऐसा नहीं कि आने वाली पीढ़ियों से उनका आसमान ही छीन लें।

आर एस लॉस्टम

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