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दर्द के खरीददार

दर्द चुपचाप सहना पर रोना नही मेरे यार
बहुत खड़े है इस बाज़ार मे तेरे दर्द के खरीददार

गम अब एक मजाक बन गया है
आदमी के गाने ओर सुनाने का एक सबाब बन गया है

दुखों का भी अब व्यापार होता है
अब कहाँ किसी का गम किसी का प्यार होता है

जज़्बातों का सैलाब अब ओझल सा होने लगा है
आदमी अपनी ही दुनियाँ मे खोने सा लगा है

सरोकार नही अब किसी को किसी के वास्ते
सबकी मंजिल अलग अलग सबके अब रास्ते

कैसे बताऊं खुद पर गुजरी किसी को
रब के अलावा कौन सुनेगा फुर्सत से इसको

ये दुनियां भी है खुदा क्या खूब है दर्द है दवा नही
यार भी कहने को खूब है पर कोई सगा नहीं

जीवन है मीलों चलना है
लडखडाते कदमों मे खुद ही सम्भलना है

बैसाखी की उम्मीद बेमानी है
साथ किसी का मिले ये सिर्फ किस्से कहानी है

आये थे तन्हा तन्हा ही मिट जाना है
जीवन की डगर भी ऐसे ही कट जाना है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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