
दिनभर लिख लिखकर जब मैं सोया,
बहुत ही गहरी सुप्तावस्था में था खोया,
अद्भुत स्वप्न एक मैने सोते सोते ही देखा,
ईश्वर खुद दे रहे थे जग का लेखा जोखा।
आदित्य मैं ऊपरवाला बोल रहा हूँ,
पूरी दुनिया का रखवाला ऊपरवाला,
भाई मैं तुम लोगों से तंग आ चुका हूँ,
हर बात में हर घटना में दोषी मैं ही हूँ।
घर का ध्यान तुम न रखो, चोरी हो
जाये तो, ऊपरवाले तूने क्या किया,
गाड़ी तुम तेज़ चलाओ, दुर्घटना हो
जाये तो, ऊपरवाले तूने क्यों किया।
पढाई तुम न करो और फेल हो जाओ,
ऊपरवाले मेरे साथ न्याय नहीं किया,
लगता है इस दुनिया में होने वाले हर
गलत काम का दोषी मुझे ही मान लिया।
और अब तो तुम लोगों ने हर काम
का एक नया फैशन बना लिया है,
जो काम तुम लोग नहीं कर सकते,
उसमें मुझे भी असमर्थ बता दिया है।
ईश्वर भी भ्रष्टाचार नहीं मिटा सकता,
ईश्वर भी महंगाई नहीं रोक सकता,
भ्रष्टाचार किसने बनाया, किसने किया,
भाई ये सब क्या है, क्या यह मैंने किया।
कब रिश्वत लेते देखा है मुझे तुमने?
हवा, पानी, धूप, आदि बराबर दिया मैने,
जाड़ों में गरीब अमीर घर धूप मैं देता हूँ,
बारिस में हर घर में बारिस भी देता हूँ।
तुम सब मेरे पास क्यों आते हो रोज़
रोज़ रिश्वत की पेशकश ले लेकर,
डब्बे लड्डू, पेड़े के कभी चादर ले लेकर,
अब खैर नहीं मुझे लड्डू का लालच देकर।
चीजों की महंगाई किसने बढ़ाई,
मैंने सिर्फ ज़मीन बना कर दे दी,
उसे टुकड़े बनाकर बेचा किसने,
पानी बोतलों में भर बेचा किसने।
जानवरों को मवेशी कह बेचा किसने,
पेंड़ काट लकड़ी गढ़कर बेचा किसने,
आज तक कोई वस्तु कभी बेचीं मैने,
किसी वस्तु का मूल्य कभी लिया मैने।
आदित्य अभी समय है आइये सुधर जायें,
मिलकर हम धरती को प्रलय से बचा पायें,
प्रकृति का वास्तविक स्वरूप बनाये रखने
का आइये मिलकर प्रयत्न हम कर पायें।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













