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संस्मरण : वो आख़िरी शाम

वह शाम मेरी स्मृति-पटल पर किसी ताज़ा चित्र की तरह अंकित है। वह केवल एक तारीख़ नहीं थी, बल्कि भावनाओं का ऐसा सैलाब थी, जिसमें हम सभी जूनियर छात्र सराबोर थे। महासमुंद की वह सुनहरी दोपहर, कॉलेज का फूलों और गुब्बारों से सजा सभागार तथा हवाओं में घुली थोड़ी-सी खुशी और थोड़ी-सी उदासी—इन सबने मिलकर एक अद्भुत वातावरण का निर्माण कर दिया था। संस्मरण का अर्थ ही है ‘सम्यक् स्मरण’ और आज जब मैं उस दिन को याद करता हूँ, तो उसका प्रत्येक क्षण अपनी संपूर्ण संवेदना के साथ जीवंत हो उठता है।

“शिक्षकों का मार्गदर्शन और आयोजन की नींव”

किसी भी आयोजन की सफलता उसकी सुदृढ़ नींव पर टिकी होती है और हमारे लिए वह नींव हमारे श्रद्धेय गुरुजन थे। हमारे विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. दुर्गावती भारतीय मैम का अनुशासनप्रिय एवं ममतामयी मार्गदर्शन हमारे लिए सदैव प्रकाश-पुंज की तरह रहा। उनके साथ ही डॉ. जीवनलाल चंद्राकर सर की विद्वता, डॉ. कलम रेखा मैम की सहजता तथा सुश्री कल्याणी साहू मैम के स्नेहपूर्ण सहयोग ने हमें इस बड़े आयोजन को सफलतापूर्वक संपन्न करने का साहस दिया।

कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत अत्यंत गरिमामयी रही। हमने मुख्य अतिथि के रूप में अपनी आदरणीया प्राचार्य डॉ. करुणा दुबे मैम तथा सभी गुरुजनों का पुष्पगुच्छ भेंट कर स्वागत किया। प्राचार्य मैम के प्रेरणादायी उद्बोधन ने न केवल विदा हो रहे वरिष्ठ साथियों को, बल्कि हम सभी को भी भविष्य की चुनौतियों का सामना करने का मंत्र दिया। उनके शब्दों में वह गुरुत्व था, जिसने प्रत्येक छात्र के भीतर आत्मविश्वास का संचार किया। विभाग के सभी प्राध्यापकों ने जब मंच से अपना आशीर्वाद प्रदान किया, तो ऐसा लगा मानो पूरा हिंदी विभाग एक परिवार के रूप में एक सूत्र में बँध गया हो।

“मंच की कमान और सहपाठियों का अप्रतिम सहयोग”

इस संस्मरण का सबसे जीवंत पक्ष मेरे सहपाठियों का वह निस्वार्थ परिश्रम है, जिसने इस शाम को अविस्मरणीय बना दिया। कार्यक्रम की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि मंच कौन संभालता है, मेरी सहपाठी ऋचा चंद्राकर ने जब मंच संचालन प्रारंभ किया, तो उनकी सुरीली आवाज़ और साहित्यिक भाषा ने पूरे सभागार को मंत्रमुग्ध कर दिया। ऋचा ने केवल मंच का संचालन ही नहीं किया, बल्कि जब उन्होंने अपनी स्वयं रचित कविता का पाठ किया, तो पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। उनकी कविता की पंक्तियों में कॉलेज के प्रति आत्मीय लगाव और बिछड़ने की पीड़ा इतनी गहराई से व्यक्त हुई थी कि अनेक आँखें नम हो उठीं।

मंच के पीछे की व्यवस्था उतनी ही चुनौतीपूर्ण थी, जितनी मंच के सामने की। यहाँ प्रवीण बघेल एक कुशल प्रबंधक के रूप में उभरे। मंच की सजावट से लेकर अतिथियों के स्वागत-सत्कार और नाश्ते की व्यवस्था तक, प्रवीण ने हर मोर्चे पर अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई। विशेष रूप से पूरे कार्यक्रम के दौरान साउंड सिस्टम की जिम्मेदारी उन्होंने अकेले संभाली। अप्रैल की तपती गर्मी में भी उनका उत्साह तनिक भी कम नहीं हुआ। उन्होंने सुनिश्चित किया कि प्रत्येक वक्ता की आवाज़ स्पष्ट सुनाई दे और प्रत्येक गीत सही समय पर प्रस्तुत हो। उनका यह समर्पण हम सभी के लिए प्रेरणादायक था।

“सांस्कृतिक रंग और भावुक विदाई”

विदाई की इस बेला में हमने मनोरंजन और संवेदना का अनूठा संगम प्रस्तुत किया। संगीत के बिना कोई भी समारोह अधूरा होता है और हमारी साथी टिकेश्वरी बंजारे ने इसे भली-भाँति समझा। उन्होंने अपनी मधुर आवाज़ में जब विदाई के गीत प्रस्तुत किए, तो पूरा वातावरण भावुक हो उठा।

माहौल को थोड़ा हल्का बनाने के लिए हमने वरिष्ठ साथियों के साथ कुछ रोचक खेल भी आयोजित किए। उन खेलों में उनका बचपन, खिलखिलाहट और उत्साह देखकर मन आनंदित हो उठा। हमने उनके सीने पर ‘स्माइल बैज’ लगाए, जो इस बात के प्रतीक थे कि भले ही वे यहाँ से जा रहे हों, किंतु उनकी मुस्कान इस विभाग की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेगी।

“आत्मचिंतन”

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो अनुभव होता है कि संस्मरण केवल बीती हुई घटनाएँ नहीं होते, बल्कि वे जीवन के वे अमूल्य क्षण होते हैं, जिन्हें हम अपने हृदय के किसी कोने में सदा के लिए संजो लेते हैं। इस विदाई समारोह के आयोजन का हिस्सा बनना मेरे लिए केवल एक दायित्व नहीं, बल्कि एक भावनात्मक यात्रा थी। एक ओर वरिष्ठ साथियों के बिछड़ने का दुःख था, तो दूसरी ओर उनके उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना का संतोष भी।

इस अनुभव ने मुझे सिखाया कि महाविद्यालय के रिश्ते केवल औपचारिक या शैक्षणिक नहीं होते, बल्कि वे परिवार की तरह आत्मीय हो जाते हैं। मेरी सहपाठी ऋचा की भावपूर्ण कविता, प्रवीण बघेल की भाग-दौड़, टिकेश्वरी के गीत तथा हमारे शिक्षकों का स्नेहपूर्ण आशीर्वाद—ये सभी स्मृतियाँ आज भी मेरे अंतर्मन में जीवंत हैं। एम.ए. हिंदी की यह यात्रा मुझे केवल साहित्यशास्त्र ही नहीं, बल्कि जीवन का सत्य भी सिखा रही है।

निष्कर्ष

कॉलेज की वह आख़िरी शाम, वह सजा हुआ सभागार और विदाई के वे मधुर सुर सदैव मेरे हृदय में महकती स्मृतियों के रूप में बसे रहेंगे। भले ही समय बदल जाए और हम सभी अपनी-अपनी राहों पर आगे बढ़ जाएँ, फिर भी महाप्रभु वल्लभाचार्य महाविद्यालय के हिंदी विभाग की वह विदाई संध्या हमेशा यह स्मरण कराती रहेगी कि हम सब एक ऐसे अटूट धागे से बँधे हैं, जिसका नाम है—प्रेम और सम्मान।

यह संस्मरण मेरे उन सभी साथियों और गुरुजनों को समर्पित है, जिन्होंने मेरे जीवन के इस अध्याय को इतना सुंदर, प्रेरणादायी और सार्थक बनाया।

डिगेश्वर पटेल

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