
,,,,,,गमे ए जिन्दगी ,,,
जिंदगी चली गई तो यह जहांन भी चला गया ,
जब चले गए हम दुनिया से अलविदा होकर,
यह पुतला श्मशानघाट पर भी छला गया ।
लोगों की बेरुखी ने नश्तर चुभाएं है इस दिल पे हर मोड़ पर ,
दिए हैं जख्म अपनों ने तन्हा छोड़ कर।
जिसने कभी पानी का भी नहीं पूछा ,
वो हि आज आके रोने का भीड़ में ढोंग कर रहे हैं,
जब तक पूरी तरह से न जला दिया गया ।।
झुठे रिश्तों को निभाते निभाते थक गया था मैं,
कि अब इस दुनियां से ग़ाफ़िल हो गया था मैं ।।
अपना समय बुरा था, इसलिए अपने ही
लोग सिक्कों की तरहां निकल गये थे ,
मेरी जेब से ,
तो क्या हुआ ,,,
समय का जादू है
जो आज कमबख्त सब इस तरहां से बेनकाब हो गये,
जायदाद के बटवारे की चिंता में हैं सारे खुदगर्जी
इसलिए पहली बार एक जगह इकट्ठा हो गए ।।
फैंसला मेरी फितरत पर टाला गया सब हिस्सा लेकर खुश थे,,,
अब मुझे एक तस्वीर में सजाया गया और माला से दीवार पर टांग दिया गया।।
सब झूठे बनावटी दुखी हो कर अपने अपने घर को चले गए,,
वो यूं जा रहें हैं जैसे जानतें नहीं,
मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं।।
बेशुमार दौलत वाले दोस्त भी मिलते हैं जिंदगी में ,
लेकिन वो भी हमें पहचानते
नहीं ।।
अशोक कुमार भवानी मंडी (राज.)













