
द्वन्द कोलाहल जटिल संवेदना
है कदाचित यह समय
निर्मम समय…
गिद्ध जैसी दृष्टि
से दिन रात
सब कुछ लीलता
वंचनाओं की वही गोठिल
दुधारी छीलता
सब निरर्थक वाद हैं
संवाद हैं
है अवांछित यह समय
निर्मम समय…
संतरण है मृत्यु पथ का
झील के अवसाद में
लालसाओं की घुली महुआ मगर अनुनाद में
धृष्ट शकुनि पार्थ
विचलित पार्श्व में
है अयाचित यह समय
निर्मम समय….
आज आकुल
और व्याकुल
धूल खाती सिद्धियाँ सब
अचकचाती लड़खड़ाती मोड़ पर हैं रिद्धियाँ सब
अर्ध चेतन अर्ध खंडित क्षुब्ध सा कुछ है
अनिश्चित यह समय
निर्मम समय ……….
के वी











