
वक़्त की भट्टी में तपकर कुंदन कर दिया,
मंजिल की राहों में जीवन अर्पण कर दिया।
सुख के साथी थे जो दुख में छूट गए,
उन मतलबी रिश्तों का तर्पण कर दिया।
अब न किसी से शिकवा न कोई गिला रहा,
टूटे हुए दिल को खुद ही सिला रहा।
छोड़ गए जो मझधार में उनको दुआ दिया,
तन्हा ही मंजिल की ओर कदम बढ़ा दिया।
कहता है अमन अब न परवाह करूंगा,
दर्पण सा सच सबसे बयां करूंगा।
जो आज गिरा है कल वही उठेगा,
मेहनत से अपनी किस्मत खुद लिखेगा।
आंधियों से लड़कर दीया जलाना सीखा।
गिर-गिर कर संभलना हमने सीखा,
जो हँसे थे कल मेरी हार पर जश्न मनाकर,
आज उन्हीं के सामने जीत का परचम लहराया।
सावनेर की मिट्टी का ये लाल कहलाएगा,
हिंदी के मंच पर नाम कमाएगा।
माँ-बाप के आशीष से आगे बढ़ता जाएगा,
अमन रंगेला बनकर दुनिया में छाएगा।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र












