
प्रथम वास्तुकार, जग के शिल्पकार तुम,
देव-शिल्पी, सृष्टि के रचनाकार तुम।
श्रम और तकनीक के प्रतीक कहाते,
कारीगरों, श्रमिकों के आराध्य देव तुम।
सतयुग में स्वर्गलोक तुमने बनाया,
त्रेता में लंका को सोने से सजाया।
द्वापर में द्वारका कृष्ण की रचाई,
इंद्रप्रस्थ पांडवों की तुमने बसाई।
वज्र इंद्र का, त्रिशूल शिव का बनाया,
दिव्य अस्त्र-शस्त्र, रथ भी तुम्हीं ने सजाया।
यंत्र-मंत्र-तंत्र के तुम आदि ज्ञाता,
विश्वकर्मा जी तुम जग के विधाता।
सत्रह सितंबर शुभ जयंती आती,
कारखानों में मशीनें पूजी जाती।
औजारों की पूजा, श्रम की पूजा होती,
तुम्हारी कृपा से कला जीवित होती।
हे प्रभु, हमें शिल्प का वरदान दो,
कर्म को ही धर्म मानने का ज्ञान दो।
आदित्य करे वंदन, हे विश्वकर्मा,
भारत को फिर से विश्वगुरु बना दो।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ












