
कैद उजाले मिले
नेवले ही नाग पाले मिले
जो निकले थे अंधेरा मिटाने यहाँ,
उन्हीं के घर में कैद उजाले मिले।
ज़मीर का हिसाब जो खोलकर देखा हमने,
तो नेवले ही नागों को पाले मिले।
सच की अलमारी में झूठ के बस्ते मिले,
हर मसीहा के पीछे सौ रस्ते मिले।
वतन में ढूंढे हमने सच्चे सिपाही,
हर कुर्सी पर बैठे दलाले मिले।
नारे विकास के थे, जेबें भर गईं,
भूखी जनता फुटपाथों पर मर गईं।
कागज़ों में गंगा तो साफ हुई,
जमीं पर नालियाँ भी न तर गईं।
हाथ में जिनके था तराजू इंसाफ का,
उन्हीं के पलड़ों में घोटाले मिले।
वादा था जिनका हक़ दिलाने का,
वो ही हक़ को नीलाम करते मिले।
सफेदपोशों की टोली निराली मिली,
हर बात उनकी जुमलों से खाली मिली।
पूछा हमने अच्छे दिन कब आएंगे,
बोले चुनाव आने दो, थाली मिली।
सच कहो तो साहब यहाँ सबको खलता है,
झूठ के दरबार में सच ही जलता है।
अमन रंगेला हँस-हँस कर आईना दिखाता है,
तब ही तो हर बेईमान अपनी नज़रों में गिर जाता है।
अंतर्राष्ट्रीय
हास्य कवि व्यंग्यकार
अमन रंगेला अमन सनातनी,
सावनेर नागपुर महाराष्ट्र_












