विधा – काव्य
पेशोपेश से भरी है जिंदगी बहुत थोड़ा और बहुत कम समझने की कोशिश करें
भाड़े पर मिली है ये जिंदगी इसके मालिक बनने के चक्कर में ना पड़े
समझ का ही फेर है इंसानी दिमाग फिर जाता है
खुदा की नसीहत में खुद ही खुदा बन जाता है
जिंदगी और मौत इंसानी मर्जी की कभी मोहताज नहीं होती
इंसान की हुकूक से परे उसके रहमो करम से आज़ाद नहीं होती
जीवन है जीने का सलीका प्रभु का धन्यवाद होता है
कर्म क्षेत्र का मैदान है खेलना ही बस हाथ होता है
क्या पाया क्या खोया अहसासों का सारा खेल है
मत उम्मीद कर कुछ नहीं तेरा मुसीबतों का रेलमपेल है
संतोष जिंदगी का सबसे बड़ा अलाप है
जिसने जान लिया समझों कटे उसके सारे पाप है
जीवन में कुछ भी अपना नहीं होता
उधार की जिंदगी में साँस का भी ठिकाना नहीं होता
संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र











