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चलते-चलते

शीर्षक – चलते-चलते

पीछे मुड़कर न देखा एक बार भी चलते-चलते
रह गयी बात जुबां पर अधूरी कहते-कहते

दर्द दिया कुछ इस तरह शीशा- ए- दिल तोड़कर
टुकड़ों को उठाते रहे हम दर्द सहते -सहते

खुदगर्ज बन गया वो इतना हमनवां मेरा
ना पिघला ए दिल अश्क देख मेरे बहते-बहते

वो मुस्कुराते रहे गैरों की बाहों में जाकर
जल के ख़ाक हो गये हम सुलगते-सुलगते

ताउम्र तेरे दीदार को तरसते रहे हम
आंखें नम ही रही राह तेरी तकते -तकते

प्रिया काम्बोज
सहारनपुर उत्तर प्रदेश

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