
भारतीय परंपराओं में जिस प्रकार हम देवी देवताओं की आराधना करते हैं, उसी प्रकार हम अपने दिवगंत पूर्वज , जो मृत्यु को प्राप्त कर चुके हैं,उनको याद करने का पंद्रह दिवस का समय ही पितृपक्ष।कहलाता है! हमारी सनातन संस्कृति के अनुसार दिवगंत पूर्वजों को सम्मान पूर्वक याद करने की जो, सूक्ष्म प्रक्रिया कहलाती है, उसे ही श्राद्ध विधि कहते हैं।
हम अपने पूर्वजों को उनकी तिथि पर पूरा सम्मान देखकर उनके लिए तर्पण दान एवं श्राद्ध विधि करते हैं। ऐसा माना जाता है कि पंद्रह दिवस के लिए हमारे पूर्वज अपने बच्चों को आशीर्वाद देने के लिए ही पृथ्वी पर आते हैं, शास्त्रीय मान्यता के अनुसार श्राद्ध वाले दिन सूर्योदय से लेकर दोपहर के बीच में श्राद्ध करने की परंपरा है हम अपनी सामर्थ्य के अनुसार इस दिन गाय,भूमि,तिल, स्वर्ण ,घी, वस्त्र ,अनाज ,गुड, नमक, चांदी या अपने पूर्वजों के प्रति श्रद्धा समर्पित करते हैं और वस्तुओं का दान देते हैं।
हमारे परिजन,जो अब हमारे बीच नहीं है,तब मृत्यु पश्चात उनको ही * पितृ * कहा जाता है ऐसा माना जाता है कि पूर्वज अर्थात पितृ सूक्ष्म लोक में निवास करते हैं इसलिए, हिंदू मान्यता के अनुसार हम पितृपक्ष में श्राद्ध एवं तर्पण कर उनकी आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं।
हमारे ऋषि मुनियों ने अश्विनी श्राद्ध पक्ष के दौरान पितरों का स्मरण कर तर्पण श्राद्ध एवं पिंडदान करने की परंपरा स्थापित की हम संपूर्ण विधि विधान द्वारा जब पितरों की मुक्ति हेतु, सद्गति हेतु परिवार के कल्याण की कामना के साथ,भावनात्मक रूप से जब हम प्रार्थना करते हैं तो, पितरों को आंतरिक भाव से शांति पहुंचाते हैं
पितृ दिवस में हमारी श्रद्धा एवं संकल्प द्वारा ही जब स्थूल भोजन जब अग्नि में होम एवं जल के द्वारा किया गया तर्पण सूक्ष्म तत्वों में बदल जाता है, तब वह वाष्प ऊर्जा में परिवर्तित हो जाता है अर्थात वैदिक ग्रंथों अनुसार सूक्ष्म सत्ताएं स्थूल भोजन को ग्रहण नहीं कर सकती वह सिर्फ उसकी सुगंध के माध्यम से ही उसको प्राप्त कर सकते है अर्थात यह पुण्य कर्म हमारे पितरों तक ऊर्जा रूप में पहुंचता है, इसीलिए तर्पण एवं श्राद्ध विधि करना आवश्यक है।
आशी प्रतिभा ( स्वतंत्र लेखिक)
साहित्यकार
मध्य , प्रदेश भारत











