
रिश्ते अकिंचन रो रहे गंगा तुम्हारे घाट में
देह ने संन्यास लिया गंगा तुम्हारे घाट में
संबंधों कि सारी कड़िया खुलती तुम्हारे घाट में
लोभ मोह लालसा के फंद मिटते तुम्हारे घाट में
दुनिया कि हकीकत दिख रही गंगा तुम्हारे घाट में
आंसू का कण कण बहता प्रवाह धार मझधार में सारे नाते मुक्त किये जाते तुम्हारे घाट में
मानव स्थिति प्रज्ञ होता गंगा तुम्हारे घाट में
सारी कड़िया खुलती पाप गठरियां खुलती गंगा तुम्हारे घाट में
दुनिया कि हकीकत दिखती गंगा तुम्हारे घाट में
लेखिका गरिमा सिंह रायबरेली












