
फख्त शिकायत, भी मुझी से ,खूब रही और खूब रही
वक्त की, थी ही शिकायत, खूब रही और खूब रही!
गैर ज़िम्मेदार रवैय्या ,उस पर तंज अपनो का मैया, खूब रही और खूब रही!
कहना उनका नासमझ सब,जिनको था कभी समझाया ,खेल कुदरत तेरा देखा ,खूब रही और खूब रही !
ओढ़ाकर अपनी पुरानी चादर ,गम उसके नीचे दफना कर ,जब जमाई महफ़िले भी, खूब रही और खूब रही!
जख़्म दे गए, जमाने भर के, जिनको बांटी थी दुआएं ,या खुदा, तेरी रिवायत, खूब रही और खूब रही!
बर्बादियों मे भी कसक न, रंजिशों मे भी तल्ख न, कैसी तेरी, सहन ए सारी, खूब रही और खूब रही!
कैसा है रे, तू ‘सरल’ सच ,पीकर बैठा ,गरल सारा सच ,उफ्फ न तेरे ज़ायके मे ,खूब रही और खूब रही!!
संदीप शर्मा सरल।
देहरादून उत्तराखंड ।।












