
वचन दिया जब प्रभु को तुमने,
बना मनुज धरनीं पे भेजा।
सत्कर्मों का दिया भरोसा,
बुद्धि विवेक साथ में भेजा।।
गर्भ में उल्टे लटके थे जब,
प्रभु को हर पल तुमने सुमिरा,
सत्य कर्म सेवा करने का,
आश्वासन देकर तूं उतरा ।।
संसार में आकर प्रभु को,
तूने है बिल्कुल बिसराया,
आके यहां तू जीवन भर,
सिर्फ माया मोह भरमाया।।
बचपन खेल कूद में बीता,
खेला खाया धूम मचाया।
यौवन दुनियादारी पड़कर
खूब सारा यश धन कमाया।।
वृद्ध भयो जर्जर हुआ तन तब,
नहि पूत-धन कुछ काम आया।
जाने की जग बारी आयी,
चौका तब सभी स्मृति आयीं ।।
पछताया नहि संगी साथी,
क्यों मैने प्रभु को विसराया।।
भाड़े पर थी मिली जिंदगी,
मालिक बनके क्यों इतराया।
भगवान दास शर्मा “प्रशांत”
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश












