
विषय – बेरोज़गारी
हाथों में डिग्री, आँखों में पानी,
कब तक चलेगी यह दर्द की कहानी?
दिन-रात जागे, पसीना बहाया,
मेहनत का अपनी कोई फल न पाया।
सूनी हैं जेबें, थके से कदम हैं,
उम्मीदों के दीपक भी अब मंद-मंद हैं।
बचपन में जिसने थे सपने सजाए,
बूढ़े वो माँ-बाप कैसे हँसाए?
रोटी की खातिर भटकना पड़ा है,
चौखट पे अब तो स्वाभिमान खड़ा है।
ताने ज़माने के सहते ही जाएँ,
अपना यह दुखड़ा किसे हम सुनाएँ?
कागज़ के टुकड़ों में योग्यता सिमटी,
किस्मत की रेखा न जाने क्यों रूठी।
सूरज उगा है पर छाई है बदली,
सपनों की अर्थी उठी है धुँधली।
कब तक सहेंगे यह ख़ामोश आंसू,
सूनी पड़ी है जवानी की आरज़ू।
माँगें न भीख, बस हक़ हम हैं माँगे,
मेहनत की रोटी मिले हर सबा में।
जागेगी उम्मीद, बदलेगी रात,
आएगी एक दिन नयी भोर की बात
रीना पटले शिक्षिका
जिला-सिवनी मध्यप्रदेश













