
धूमधाम से मनाओ जयंती राधाष्टमी का
उसके जन्मदिवस था मादो माह के शुक्ल पक्ष का
अष्टमी तिथि थी वो,लिये जब जन्म राधा रानी
हर्षोल्लास से भर उठे वृषभानू और माता कीर्त्ती रानी ।
रावल ग्राम के बरसाना था उनका जन्म स्थान
निकट मे ही बसे है कान्हा का भी गोकूल धाम
जन्म से ही बंद थी नयन राधा रानी का
खुली नयन तब जब कान्हा ने स्पर्श किया राधा के पाणि का ।
जन्म से ही कान्हा की वो बनी प्रेम की प्यारी
कान्हा के मुरली की धुन ,राधा को लगती बडी प्यारी
प्रेम से राधा पुकारे कान्हा को कहकर ,मुरारी
सखियो के संग राधा खेले,नगर के गली गली ।
राधा ही कृष्ण है,कृष्ण ही राधा,ऐसी है मान्यता
दिल मे जिसके निश्चल है,वही ये है समझ पाता
लीला रचने आये दोनो धरा पर,ये तो है पता
प्रेम का सच्ची मायने हमसबो को दिये बता ।
श्याम रंग के कान्हा गौर रूप मे है राधा
श्रीदामा के श्रापवश दोनो के संग संग रहने मे आयी बाधा
आजीवन कान्हा का अनुकरण करते जीये राधा रानी
अंत समय मे कान्हा मे विलीन हुए,अंत हुई कहानी ।
चुन्नू साहा पाकूड झारखण्ड













