
तुम हो मेरे दिल -ए-जिगर
क्यों ये दिल कहे मगर
तुम्हारी यादों के हसीन साए
मेरे दिल जेहन में इस कदर छाए
मेरा दिल है गहरा नीला सागर
तुम प्यार के हिचकोले खाते रहे मगर
फिर न जाने क्यों तुम्हारा बावला प्यार
मेरे दिल को न जाने क्यों तोड़ डाला
मेरा दिल कोई खिड़की का शीशा नहीं
तूने जो तूने एक पल में ही तोड़ डाला
तुम्हें क्या..? मेरे दिल का घाव तो दिखता ही नहीं
हर पल तुम्हारे लिए मैं मचलता है
तुम्हारे एहसास में खोई रहती हूं
तुम मेरे शहर में आए और मुझसे मिले बिना ही वापस लौट गए
मुझे ऐसी कौन सी शिकवा शिकायत हो गई
कितना कठिन होता है इतने पास होकर भी तुम मुझसे दूर हो जाते हो
तुम मुझे छोड़कर यूं ना जाओ
तेरे बिना मेरी रूह भी नहीं निकल पाएगी
हर धड़कन में तुम्हारी तस्वीर बसी है
रोम रोम में तुम ही बसे हो
तुम्हें दूर से ही चाहना मंजूर है मुझे
मेरी इबादत पर गुरूर है मुझे
तुम हो मेरे दिल के प्यार भरे अफसाने
ये तुम्हारा मुंह मोड़ना तड़पाता है मुझे
डॉ मीना कुमारी परिहार













