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भ्रष्टाचार

विधा – काव्य

देश मे नियम कानूनों की भरमार है
कारण आकन्ठ डूबा भ्रष्टाचार है

जीना आम आदमी का बेकार है
गर वो कर्म से इमानदार है

कलयुग है पाप आपकी जरूरत है
इज्जत से जीने की हर हाल सूरत है

जीवन जीना भी अपने आप मे एक चुनौती है
इन्सान ही इन्सान के वास्ते एक बड़ी पनौती है

एक दूजे को रौंद्कर चलने का आज दस्तूर है
साथ एक दूजे का देना यकीनन एक कसूर है

व्यवस्था है आपकी ही देन है
फिर भी आप ही बेचैन है

शिकार भी हम है शिकारी भी है
इस कलयुगी व्यापार के अधिकारी भी है

भ्रष्ट है भ्रस्टाचार पर ही घड़ियालि आँसूं बहा रहे है
मौका जिसको मिल रहा है नौंच खन्चोट खा रहे है

ये ही कलयुग का है शानदार कारोबार
इमानदार बन करते रहो भ्रष्टाचार


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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