
18 तारीख की दोपहर करीब तीन बजे का समय था। मैं रसोईघर से खाना निकाल रही थी। तभी अचानक ध्यान आया—अरे, सवा तीन बजने वाले हैं!
कई दिनों पहले ही मैंने अपनी एक कविता लिखकर रखी थी। सोचा था कि एडिटर पर पोस्ट कर दूँगी, लेकिन समय ही नहीं मिल पा रहा था। उसी समय मैं कविता पोस्ट करने लगी तो न जाने क्यों मेरी नजर शालिनी पर टाइप करते हुए पड़ी ।
कई दिनों से हमारी फोन पर बात नहीं हुई थी।
कुछ दिन पहले उनका स्टेटस देखा था। स्कूल के बच्चों के साथ उनका एक वीडियो और कुछ तस्वीरें थीं। उन्हें देखकर मैंने लिखा भी था—
“कैसी हैं? सच में आपको मिस कर रही हूँ।”
बस इतना ही संदेश भेज पाई थी। उसके बाद बात नहीं हो सकी।
उस दिन कविता पोस्ट करने के बाद अचानक मन हुआ—चलो, आज फोन कर ही लेती हूँ। आखिर कब तक टालती रहूँ?
मैंने फोन मिलाया।
“राधे-राधे, शालिनी जी … कैसी हैं आप?”
उधर से आवाज आई—
“राधे-राधे, ज्योति जी…”
लेकिन उस आवाज में वह उत्साह नहीं था, जो उनकी बातों में हमेशा हुआ करता था। आवाज बहुत धीमी और बुझी-बुझी सी थी।
मैंने पूछा,
“क्या हुआ? आप इतनी धीमी आवाज में क्यों बोल रही हैं? सब ठीक है?”
और फिर जो मैंने सुना, उस पर कुछ पल के लिए मुझे विश्वास ही नहीं हुआ।
उन्होंने कहा—
“मेरे पति नहीं रहे, ज्योति जी… और उनके जाने के एक महीने बाद मेरी सासू माँ भी चली गईं।”
मेरे हाथ जैसे वहीं रुक गए।
मैंने कहा,
“क्या बोल रही हैं आप? कह दीजिए कि यह सब झूठ है… कह दीजिए कि मैं जो सुन रही हूँ, वह सच नहीं है।”
लेकिन वह सच था।
चार महीने बीत चुके थे और मुझे इस घटना की भनक तक नहीं लगी थी। न मुझे पता चला, न शायद मंच पर किसी और को।
मैंने उनसे पूछा,
“इतना सब हो गया और आपने किसी से कहा तक नहीं?”
उन्होंने धीमी आवाज में कहा—
“ज्योति जी, किससे कहती? पति-पत्नी की बातों को भी कहाँ कोई महत्व देते है… मैंने कितना मना किया था। कहा था कि हवाई अड्डे के पास जमीन मत लीजिए। हम अकेले कहाँ-कहाँ जाकर सब देखेंगे? आपका पहले से जो काम चल रहा है, उसी पर ध्यान दीजिए। मेरा भी तो अपना प्ले स्कूल है। सब कुछ अकेले कैसे संभालेंगे?”
दस जगह लेने से होता है केवल,उसकी निगरानी भी करनी पड़ती है ।
वह अपने पति को याद करते हुए बताती रहीं—
“वह कहते थे—सब हो जाएगा। तुम बहुत चिंता करती हो। खाना खा लो… क्यों घबराती रहती हो?”
लेकिन वह नहीं माने।
नई जमीन पर काम लगवाए हुए थे । उसी काम से लौटते समय उनका एक्सीडेंट हो गया।
और वह इंतजार करती रह गईं…
उनकी आवाज में एक ऐसा खालीपन था, जिसे शब्दों में लिखना आसान नहीं।
“जिंदगी भर का साथ था, ज्योति जी… बाईस साल का सफर। हम दोनों सिर्फ पति-पत्नी नहीं रहे थे, एक-दूसरे के बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे। अब कौन देगा मेरा साथ?”
मैं चुप थी।
कुछ दुख ऐसे होते हैं, जिनके सामने सांत्वना के सारे शब्द छोटे पड़ जाते हैं।
उन्होंने आगे कहा—
“बच्चे दोनों बाहर पढ़ते हैं। बड़ा बेटा अभी मेरे पास है, स्कूल जाता है। घर भी तो चलाना है। स्कूल भी देखना है। कभी-कभी मन करता है कि सब छोड़ दूँ… बस यूँ ही पड़ी रहूँ। लेकिन फिर लगता है, अब मुझे ही तो सब संभालना है।”
मैंने उन्हें बस इतना कहा—
“शालिनी जी, आप खुद को संभालिए। अपना स्वास्थ्य सबसे पहले रखिए। आपको मजबूत बनना होगा। मैं जानती हूँ कि यह आसान नहीं है। लेकिन आपके बच्चों के लिए, आपके स्कूल के लिए और सबसे बढ़कर आपके अपने लिए… आपको खड़ा होना ही होगा।”
फोन रखने के बाद मैं बहुत देर तक सोचती रही।
जिस इंसान से कुछ दिन पहले तक हम सामान्य बातें करते थे, उसकी जिंदगी में इतना बड़ा तूफान आ चुका था और हमें पता तक नहीं चला।
कभी-कभी हम सोशल मीडिया पर किसी की एक तस्वीर देखते हैं, कोई वीडियो देखते हैं और समझते हैं कि सब ठीक है।
लेकिन तस्वीर के पीछे की जिंदगी कौन जानता है?
किसी की मुस्कुराती हुई तस्वीर के पीछे कितनी रातों की खामोशी छिपी है, यह हम नहीं जानते।
उस दिन मुझे एक बात फिर समझ आई—
किसी अपने को याद आए, तो सिर्फ संदेश करके मत रुकिए।
एक बार फोन जरूर कर लीजिए।
क्योंकि कभी-कभी आपकी एक आवाज किसी के अकेलेपन में साथ बन सकती है।
और शायद उस दिन मेरा फोन भी सिर्फ एक फोन नहीं था…
किसी अपनी ही सखी तक पहुँचने की एक छोटी-सी कोशिश थी।
कवयित्री ज्योति बरनवाल, नवादा (बिहार)











