
मैं सनातन भारत का, अंगार धधकती ज्वाला हूँ,
मैं अमृत का सागर हूँ, तो मैं ही विष का भी प्याला हूँ।
मेरा हृदय वट-वृक्ष-सा विशाल, मैं दुनिया का पोषक हूँ,
नरसंहार मेरा भूत नहीं, मैं भविष्य का उद्घोषक हूँ।
मैं ही स्वामी विवेकानंद बन दुनिया को सद्ज्ञान दिया,
महर्षि अरविंद की तप ने इस धरती को नवज्ञान दिया।
सुभाष,भगत,राणा,कुँअर ने दुश्मनों का कलेजा कंपा दिया
प्रेम बिहारी,राजेन्द्र बाबु ने भारत को नया संविधान दिया
मेरे लहू के कण-कण में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ समाई है,
मेरी धरती के गंगाजल से दुनिया ने प्यास बुझाई है।
मैं शिव बन कल्याण जगत का पल-पल सोच में ढाला हूँ,
मैं ही शंकर का क्रोधनल बन अधर्म मिटाने वाला हूँ।
पापियों के सर्वनाश हेतु रणचंडी का प्रचंड प्रहार हूँ मैं,
सूर्योदय की लालिमा बन संसार का तारणहार हूँ मैं।
समष्टि हित के लिए मैंने व्यष्टि का बलिदान दिया,
धरती पर साम्राज्य बनाने कब मैंने रक्तपात किया?
मैं माँ बनकर जग को अपने वक्षस्थल से पाला हूँ,
पिता जैसा निर्देशक बन हर राष्ट्र का भार संभाला हूँ।
कब मैंने हिन्दू बनाने घर-घर जाकर नरसंहार किया?
राम नाम का आसरा लेकर कब, कहाँ अत्याचार किया?
जाति, धर्म और राष्ट्र का करता कभी मैं भेद नहीं,
सब हैं सनातन की संतान, मैं हिन्दू हूं, मुझको खेद नहीं।
जब-जब अत्याचार बढ़ेगा, मैं शंकर का त्रिशूल बनूँगा,
जब-जब धरती पर अधर्म बढ़ेगा, मैं धर्म का संबल बनूँगा।
डमरू की मंगल-ध्वनि से नवयुग का आह्वान करूँगा,
प्रेम, सत्य और न्याय लिए मानवता का कल्याण करूँगा।
नहीं किसी के विनाश की मेरी कोई अभिलाषा है,
धर्म रहे, मानवता बचे—बस इतनी मेरी आशा है।
विश्वबंधुत्व का दीप जलाकर तम को दूर भगाऊँगा,
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का संदेश जगत को सुनाऊँगा।
मैं हिन्दू हूँ, सनातन हूँ, सत्य-सद्भाव की धारा हूँ,
अमृत बाँटने वाला भी हूँ, अन्याय के सम्मुख अंगारा हूँ।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड











