
धर्मशास्त्र के अनुसार गया की 54 वेदियों में विष्णुपद का प्रथम स्थान है।
इसके दर्शन मात्र से ही से ही पितर नारायण रूप हो जाते हैं। गया कि फल्गु नदी में स्नान और तर्पण करने से पितरों को देव योनि प्राप्त होती है। हिंदू समाज का दृढ़ विश्वास है कि गया में श्राद्ध पिंडदान करने से सात पीढ़ियों के पितरों को मुक्ति मिल जाती है।
बिहार के गया जी में पिंडदान का बेहद खास महत्व है। कहा जाता है कि गया में भगवान राम और सीता ने पिता राजा दशरथ का पिंडदान किया था। गरुड़ पुराण के मुताबिक अगर यहां पितृपक्ष में पिंडदान किया जाए तो पितरों को सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। धार्मिक मान्यता है कि भगवान श्री हरि यहां पर पितृ देवता के रूप में विराजमान रहते हैं। इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है।
गया के धर्म पृष्ठ, ब्रह्म सप्त, गया शीर्ष और अक्षय वट के समीप जो कुछ भी पितरों को अर्पण किया जाता है, वह अक्षय होता है। गया के प्रेतशिला में पिंडदान करने से पितरों का उद्धार होता है । यह भी मानता है कि गया तीर्थ में श्राद्ध कर्म पूर्ण करने के बाद भगवान विष्णु के दर्शन करने से मनुष्य पितृ,माता और गुरु के ऋण से मुक्त हो जाता है।
गया में श्राद्ध को लेकर यह प्रचलित कथा है। गयासुर नाम के एक असुर ने घोर तपस्या करके भगवान से आशीर्वाद प्राप्त किया। फिर वह आशीर्वाद का दुरुपयोग करके देवताओं को ही परेशान करने लगा। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वह गयासुर से देवताओं की रक्षा करें। भगवान विष्णु ने गदा से गयासुर का वध कर दिया। बाद में उन्होंने गयासुर के सिर पर एक पत्थर रखकर उसे मोक्ष प्रदान किया। ऐसा कहा जाता है कि गया स्थित विष्णु पद मंदिर में वह पत्थर आज भी मौजूद है। भगवान विष्णु द्वारा गदा से गयासुर का वध किए जाने से उन्हें गया तीर्थ में मुक्तिदाता माना गया है। गया तीर्थ में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किए जाने के बारे में इस प्राचीन कथा का उल्लेख पुराणों में मिलता है।
गया में पितरों का श्राद्ध का बहुत ही महत्व है।
डॉ मीना कुमारी परिहार











