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सूना कर घर बार कहाँ मुँह मोड़ चले


पंछी तो अब नीड़ हमारा छोड़ चले

आँगन चौखट दरवाज़े देखें रस्ता
सबसे रिश्ते नाते जैसे
तोड़ चले

धूप सुनहरी आज जलाती है तन मन
बादल बारिश से तुम रिश्ते जोड़ चले

आँखों को रोने की आदत थी लेकिन
बहते आँसू बारिश से कर होड़ चले

समझा था मुझको भी एक सहारा है
पर जाने क्यूँ मन को तुम झंझोड़ चले

भीतर कुछ गहरी चोटों के छाले थे
उन दुखते छालों को ही तुम फोड़ चले
के वी

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