
राष्ट्रकवि दिनकर! तुमने हिंदी जग में,
जलाई मशाल अखंड ज्ञान की।
अन्याय के विरुद्ध उठी कलम तुम्हारी,
बन गई धार प्रखर स्वाभिमान की।।
जब रण में गूँजी हुंकार वीरता की,
जब मौन हुआ जनमन अन्याय के भार,
तब तुम्हारी लेखनी ने स्वर देकर,
जगा दिए सोए हुए अंगार।।
“कलम, आज उनकी जय बोल” की पुकार में,
वीरों के त्याग का उजला इतिहास था।
मातृभूमि पर मिटने वालों के चरणों में,
कवि का शब्द स्वयं श्रद्धा का प्रकाश था।।
‘दिल्ली’ ने शासन को झकझोरा,
‘कुरुक्षेत्र’ में गूँजी युग की पुकार।
‘रश्मिरथी’ ने कर्ण-वेदना को स्वर दिया,
‘उर्वशी’ बनी सौंदर्य-सुधा की धार।।
‘द्वन्द्वगीत’ में जीवन-रस छलका,
‘प्रणभंग’ से हुंकार गगन तक गई।
‘संस्कृति के चार अध्याय’ ने जग को,
भारत की सांस्कृतिक गाथा कह दी।।
‘इतिहास के आँसू’ बोल पड़े फिर,
‘धूप-धुआँ’ में यथार्थ मुखर हुआ।
‘नीम के पत्ते’ कड़वे सच कह गए,
‘वट-पीपल’ में लोकजीवन निखर उठा।।
‘हारे को हरिनाम’ में पीड़ा की आहें,
रोटी छिनने का दर्द मुखर हुआ।
‘शुद्ध कविता की खोज’ में कवि ने,
सत्य और सौंदर्य का पथ चुना।।
सिमरिया की पावन धरती धन्य हुई,
जहाँ जन्मा वह ओजस्वी विभापुत्र।
उत्तर में उगा था दिनकर बनकर,
जिसकी आभा से दमका भारत-पुत्र।।
आज भी तुम्हारी लेखनी की ज्वाला,
अन्याय के तम में राह दिखाती है।
कलम आज उनकी जय बोल—यह ध्वनि,
पीढ़ी-दर-पीढ़ी चेतना जगाती है।।
हे राष्ट्रकवि! शत-शत नमन तुम्हें,
अमर रहे तुम्हारी ओजस्वी वाणी।
भारत के कण-कण में गूँजता रहे,
तुम्हारे शब्दों का दीपक कल्याण
डाॅ. सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर,













