
आज सपने में कोई मेरे आ गया।
बहुत बड़ी बात आकर समझा गया।
कहने लगा वह मुझसे।
मुझे सब बहुत तकलीफ पहुंचाते हैं।
बड़े-बड़े ढोल मेरे कानों के पास बजाते हैं।
नाचते-गाते मुझे घर ले आते हैं।
कुछ दिनों का मुझे मेहमान बनाते हैं।
कई तरह के पकवान खिलाते हैं।
रोज सबसे पहले भोग मुझे लगाते हैं।
मेहमान की तरह मुझे हर तरह से खुश करते हैं।
कहीं मैं नाराज न हो जाऊं,
इस बात का सब बहुत ध्यान रखते हैं।
लेकिन…….
क्या यह उन्हें मालूम नहीं हैं?
मैं तो हूं बस श्रद्धा का भूखा।
मुझे पसंद न कोई दिखावा।
मुझे चाहिए बस श्रद्धा के दो सुमन।
बहुत सरल हैं मेरा पूजन।
क्यों मुझे दुकानों से लाकर,
कुछ दिन का हैं मेहमान बनाते।
नहीं मंजूर मुझे इस तरह की मेहमानी।
क्या कभी किसी ने हैं मेरे दिल की जानी।
मैं तो हरदम चाहूं रहना संग तुम्हारे।
जो तुम मुझे इस तरह नदी में न डुबोते।
घर के आंगन की मिट्टी को ही तुम मेरा रूप दे देते।
फिर वापस घर के बगीचे में ही विसर्जित कर देते।
फिर मैं भी हरदम रहता संग तुम्हारे।
जो कोई आती परेशानी तुम्हारे घर के द्वारे।
मैं रास्ता उसका रोक लेता।
तुम्हारे घर में न उसे प्रवेश करने देता।
तुम न बनाओ मुझे कुछ दिनों का मेहमान।
नहीं हूं मैं कोई तुम्हारे घर का सामान।
मैं हरदम तुम्हारे संग रहना चाहता हूं।
तुम न यूं कुछ दिनों का मेहमान बनाओ।
अब तो तुम मुझे पहचान ही जाओ।
मैं तो हूं वहीं तुम्हारा ‘गन्नू भैया’।
अब न कोई मुझे यूं मेहमान बनाना।
अब न कोई मुझे यूं नदी में डुबाना।
मेरा यह संदेश तुम घर-घर पहुँचाना ||
स्वरचित
मंजू अशोक राजाभोज
भंडारा (महाराष्ट्र)













