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मुझे क्यों लाठी से मारे ये इंसान

तुम हो पत्थर के और मुझमे है जान तुम हो पूजे जाते हो मुझे क्यों लाठी से मारे ये इंसान

विधा – काव्य

पत्थर में जान और मुझ जान से अनजान हे मनुष्य तू
पत्थर पूजे और लाठी से मारे ए निरा मूरख इंसान तू

भोग प्रसाद चढ़ाये तू पत्थर के मुंह पर
मुझे भटकाये तू गली मोहल्ले चौराहे आहार खातिर

सलामती की दुआ करे पत्थर के सामने ए धिक्कारे
ईश्वर की जीती जागती सजीवता को नजर पर नकारे

देवत्व का साकार रूप हम गौ माता शास्त्रों में कहलाते है
माँ के दूध के विकल्प दूध हमारा अस्तित्व तुम्हारा बचाते है

क्रोध विकारों से रहित हम शांतचित्त तुम्हारे पापों को क्षमा करते हैं
उद्देश्यपूर्ण स्वार्थपूर्ण भावों से भरा तुम्हारा मान भी सर आँखों पर हम रखते है

देवत्व अंगीकार कर धरा पर विचरण करते है आशीष देते है
ए मूरख मनु पत्थरों में क्यों स्वहित कृपा तलाशते है

कर मुझसे प्रेम ए मनुष्य मातृत्व प्रेम से पूर्ण हृदय हैं हमारा
मत कर तिरस्कार हमारा दो जख का पाप छिपा है इसमें तुम्हारा

गौ माता पूजना हिंदुत्व का सार्वभौम सार है
गौ सेवा ही हिंदुत्व का सत्य शाश्वत विहार है


संदीप सक्सेना
जबलपुर म प्र

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