
ज़िंदगी का सफ़र काग़ज़ की नाव सा है,
कभी लहरों में हँसता, कभी डर सा है।
हर मोड़ पर कुछ छूटता, कुछ मिलता जाता,
हर अनुभव दिल को थोड़ा और गहराता।
कभी सपने आँखों में उजाला भरते हैं,
कभी सच की आँधी में बिखरते हैं।
कुछ अपने साथ चलकर थक जाते हैं,
कुछ पराए भी दुआ बनकर निभा जाते हैं।
दर्द ने सिखाया मुस्कुराना कैसे,
ख़ामोशी ने बताया बोलना कैसे।
हर हार ने भीतर साहस जगाया,
हर गिरने ने फिर खड़ा होना सिखाया।
ज़िंदगी का सफ़र रुकता नहीं है कभी,
बस चलना है—धीरे सही, पर सही।
क्योंकि मंज़िल से ज़्यादा कीमती है ये राह,
जहाँ हर पल सिखाता है जीने की चाह।
डॉ रुपाली गर्ग नारी स्वर
मुंबई महाराष्ट्र













