
भीड़ बहुत थी,
हर चेहरा अपनी पहचान लिए खड़ा था,
हर कोई आगे बढ़ना चाहता था,
और ज़िंदगी…चुपचाप अपनी जगह तलाश रही थी,
कभी किसी ने रास्ता रोका,
कभी परिस्थितियों ने कदम बाँधे,
कभी अपनों की अपेक्षाओं ने ,
अपने सपनों से दूर कर दिया,
फिर भी ज़िंदगी रुकी नहीं,
उसने सिखाया
भीड़ में शामिल होना आसान है,
लेकिन भीड़ के बीच अपनी पहचान बनाना
एक लंबी यात्रा है, हर गिरना उसे कुछ सिखाता रहा,
हर असफलता भीतर एक नया साहस जगाती रही,
जिसे लोग कमजोरी समझते रहे,
वही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनती गई,
आज भी वह भीड़ में है, मगर अब खोई हुई नहीं—
अपने निशान छोड़ती हुई, अपनी राह बनाती हुई,
अपनी कहानी लिखती हुई।।।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













