
माटी में जिनकी खुशबू है,
आँखों में जिनका मान,
उन पितरों के चरणों से ही,
मिलता हमें संस्कारों का ज्ञान।
जिन्होंने त्याग की राह दिखाई,
सत्य-धर्म का दीप जलाया,
मुश्किल में भी हँसना सिखाया,
जीवन का सच्चा अर्थ बताया।
उनकी मेहनत की छाँव तले,
हमने सपनों को पंख दिए,
उनके आदर्शों को अपनाकर,
जीवन को सुंदर रंग दिए।
रीति-रिवाज और संस्कृति की,
जिनसे मिली हमें पहचान,
उनकी स्मृतियाँ बनकर रहतीं,
हम सबके हृदय में महान।
वटवृक्ष की गहरी जड़ों-से,
पितर हमारे आधार हैं,
उनके कारण आज हमारी,
संस्कृति और संस्कार हैं।
आओ उनकी राह चलें हम,
सत्य-सदाचार अपनाएँ,
उनकी पावन स्मृतियों को,
अपने कर्मों में दोहराएँ।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलता जाए,
संस्कारों का यह उपहार,
हमसे अगली पीढ़ी तक पहुँचे,
पितरों का पावन संस्कार।
नमन उन्हें, जिनसे हम हैं,
नमन उनके त्याग महान,
हमारे पितर ही तो हैं,
संस्कारों की जड़ और प्राण।
रचनाकार:
नंदकिशोर गौतम
(माध्यमिक शिक्षक)
शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बकोड़ी
जिला — सिवनी, मध्य प्रदेश













