
दिखावे की शरीफ़ बनने की आदत गई नहीं उनकी,
आज भी चेहरे पर नक़ाब लगाए घूमते हैं।
दोष आईने को देते हैं, ख़ुद के दाग़ छुपाते फिरते हैं,
अजीब फ़ितरत है उनकी, ख़ुद को बेदाग़ बताते फिरते हैं।
बस हमारी नज़रें क्या मिलीं उनकी नज़र से,
वो ख़ुद को शरीफ़, हमें बदमाश बताते फिरते हैं।
चेहरे पर शराफ़त, दिल में फ़रेब छुपाए बैठे हैं,
और ज़माने भर में ख़ुद को नेक इंसान बताते फिरते हैं।
शहर को फूँक रहे हैं, पूछो तो कहते हैं—
“मैं तो आग बुझाने आया था।”
हाथों में शोलों का सामान लिए फिरते हैं,
और कहते हैं—“हमें शहर बचाने आया था।”
आदमी तो शरीफ़ हुआ करता था,
पता नहीं किस बात से रूठे बैठा है।
अक्सर बेगानों की शादी में दिख जाता था,
और अपनी ही शादी में शायद गुमशुदा था।
अक्सर सबब बनता रहा हँसने का ख़ुद पर,
न जाने कब से ख़ुद ही ख़ुद का तमाशा बना बैठा हूँ।
लोग कहते हैं आशिक़ हैं, इसलिए आशिक़ाना मिज़ाज है,
उन्हें क्या पता, हम तो हर दर्द को मोहब्बत समझ बैठे हैं।
आर. एस. लॉस्टम













