
किसी के दिल की बात समझने में देर हो जाती है,
कभी ख़ामोशियाँ पढ़ने में देर हो जाती है।
वो हर दर्द अपना मानकर चुपचाप सहता है,
हमें उस दर्द को समझने में देर हो जाती है।
वो हर ख़ुशी में साथ हँसता, हर ग़म में साथ रहता,
मगर उस साथ की क़दर करने में देर हो जाती है।
हमें लगता है—वो अपना है, कहीं जाएगा नहीं,
इसी विश्वास में रिश्ते सँभालने में देर हो जाती है।
वो आँखों से मोहब्बत की कहानी कहता रहता है,
हमें उन आँखों को पढ़ने में देर हो जाती है।
वो इंतज़ार करता है कि शायद हम समझ जाएँ,
मगर उसको समझ पाने में देर हो जाती है।
समय अपनी ही रफ़्तार से आगे निकल जाता है,
बिछड़ने के बाद मिलने में देर हो जाती है।
जिसे कल तक बहुत पास पाकर भी क़दर न की,
उसी की एक झलक पाने में देर हो जाती है।
नहीं बोलता अक्सर मोहब्बत करने वाला दिल,
मगर उस प्रेम को समझने में देर हो जाती है।
रिश्ते टूट जाएँ तो इंसान कहाँ बदलता है,
बस वापस लौटने के रास्ते में देर हो जाती है।
“लॉस्टम” प्रेम को इतना भी न टालो ज़िंदगी में,
कभी समझो अगर—तो कहने में देर हो जाती है।
आर. एस. लॉस्टम













