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कविता

एक लफ्ज़ ही गुलाब
की
*एक कविता है,

एक कविता,मुशायरा सा लगता है,

उनके दिलो-दिमाग में, दोस्तों को दब दबा पसंद नहीं है,

फिर भी उनकी गज़ब की दादागिरी है।

डाटने की प्यार से
गजब की कारीगरी है,

कांटों से भरा हुआ है मेरा दामन,

दामन में खुशियां बेशुमार है,

मोहब्बत में नफ़रत भी है ,,,

और नफ़रत में मोहब्बत है,

ज़हन में उनके कई राज है,

राज छिपा कर रखना याद है उनको,

और मैंने अमल में मोहब्बत को ही काम पर लगा रखा है,

नाम
ग़ुलाब
है मैरा ,,

दूर दूर तक फैला हुआ है खुशियां बांटने में खुश्बू का मिज़ाज रखता हूं।।

अशोक कुमार सुमन भवानी मंडी (राज.)

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