
नभ के आँगन में चमकता,
उज्ज्वल एक सितारा था,
चाहने वालों के दिल में,
नाना सबका प्यारा था।
दीप बुझा यूँ कला-जगत का,
भू पर छाया अंधियारा,
छोड़ गया वह अपनी रौशनी,
देकर अनुपम उजियारा।
भावों के हर एक रंग को,
सहज रूप आकार दिया,
पात्र जिये और संवादों को,
कड़क निराला आधार दिया।
धूप-तपन में जलकर जिसने,
संघर्षों का भी मान किया,
‘नाम’ बनाया जग में अपना,
नूतन एक अभियान किया।
स्मृति-नगर में गूँज रही है,
आज उसी की तान यहाँ,
मौन हुए सब स्वर पर बोलती,
अभिनेता की साधना वहाँ।
देह नष्ट होता है लेकिन,
व्यक्तित्व कहाँ मिट पाता है,
कर्म-सुगंधित बनकर जग में,
नाम अमर हो जाता है।
श्रद्धा के ये सुमन समर्पित,
स्मृतियाँ सब महकाएँ,
हे अनमोल सितारे ‘नाना’!
कलाएँ तेरी चमकाएँ।
कला के महानायक: नाना पाटेकर जी को समर्पित 🙏
पूर्णिमा सुमन
धनबाद













