
कविता
तेरे मेरे सपने जो सजने लगें हैं ,
आसमां में मस्ती भरे
मेघ बरसने लगें हैं,
बादलों का मौसम आया फिर से लौट कर,
हवाएं महकीं महकीं है,
परिंदें सभी चहकने लगें हैं,
एक मुद्दत से मिल न सके थे,
मिलने को मन तरसने लगें हैं ,
नयन जो मिले तो हम बेसूध हों गए है ,
दिल भर आया खुदा का भी आज,
देख कर बहती आंखों की धारा को,
समंदर की आंखों में भी पानी आ गया ,
देखने वालों के दिल यहां तरसने लगें हैं।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)













