
आई बारी जब इस युद्ध की ,
जब ध्वनि प्रसारित हुआ शंख ,
तन मन में अजीब आई फुर्ती ,
उग आए हमारे वीरता के पंख ।
कृष्ण ने हमें मस्तिष्क दिया ,
कृष्ण ने हमें वह धैर्य दिया ।
कृष्ण ने हमें वह बल दिया ,
कृष्ण ने ही हमें शौर्य दिया ।।
क्यों न उगे वीरता के पंख ,
जब बिच्छू ने मारा हो डंक ।
या सर्प चला हो हमें डॅंसने ,
या बचे हों तन में ही कंक ।।
ठोकर ही तो बुद्धि है होता ,
ठोकर ही होता यह ज्ञान ।
ठोकर लगते जब भयंकर ,
तब बन जाते हम महान ।।
वीरता नहीं बातों की होती ,
गुलामी है जब बुद्धि सोती ।
आया अय्याशी जीवन में ,
तब जीवन से खोता मोती ।।
बिन चक्षु के मिले ज्योति ,
धरा पे मिले बिखरे मोती ।
लग जाए ये वीरता के पंख ,
ये श्वेत तन मन कुर्ता धोती ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।













