
नासमझी में अपनों का हाथ अपनों से छुट गया,
जो रिश्ता अटूट था, पल भर में टूट गया।
मां- पिता का आँगन, सब फल फुलों से सजे थे,
न कोई चिन्ता न फिक्र हमें, हम बच्चों के तो मजे थे,
वो लोग चले क्या गए, हँसता चमन ही उजड़ गया।
जो रिश्ता अटूट था, पल भर में टूट गया।
भाई बहन जब बच्चे थे, मन से सच्चे अच्छे थे,
न कोई ईर्ष्या न द्वेष कोई, एक ही थाली में खाते थे,
बड़े हुए तो टूटे बिखरे,वो सुनहरा पल ही छुट गया।
जो रिश्ता अटूट था, पल भर में टूट गया।
तुम ही बुरे हम अच्छे हैं, तुम झूठे हम सच्चे हैं,
इतना ही हमारी अक्ल में है, तुम कच्चे हम पक्के हैं,
हमारी इसी अकड़ से, हर बन्धन बिखर गया।
जो रिश्ता अटूट था, पल भर में टूट गया।
अपनों की गुप्त बातें, जग को बताने में शान समझा,
जो मसला घर का ही था, सरेआम महफिल में गुंजा,
ग़ैरों की झूठी वाहवाही में, अपनों का साख गवां गया।
जो रिश्ता अटूट था, पल भर में टूट गया।
तिल को बनाया ताड़, हम ही जीतेंगे तुम हार,
कुछ लोगों ने रिश्तों को भी, बना दिया व्यापार,
त्याग प्यार की वो रौनक, जाने अब कहां गया।
जो रिश्ता अटूट था, पल भर में टूट गया।
अपनों में ही चुगलखोरी, जिस घर में थोड़ी भी थोड़ी,
पल भर में टूट जाती है, रिश्तों की मजबूत डोरी,
माफी,अनदेखी, निस्वार्थ भाव, जाने अब कहां गया।
जो रिश्ता अटूट था, पल भर में टूट गया।
रवि भूषण वर्मा
राँची झारखंड













