
नई तस्वीरें खिंचे तो
जरूरत पड़ती है हंसाने की ,
आजकल किसी के भी चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं होती ,
हजारों चिंताएं होती हैं ज़माने की ,
वो पुरानी तस्वीरें हैं गवाह,
हमारे मुस्कुराने की,
पुरानी तस्वीरें हटाने को दिल नहीं करता,
पुरानी तस्वीरें तो अदा है उस ज़माने की ,
हम हंसते हुए फिदा हुए थे कभी किसी पर,
कभी यह गवाही देंगी हमारे जमाने की ,
न आरज़ू थी न जुक्षजू थी,
न कोई तमन्ना थी,
एक आदत सी बन गई थी बस उसकी गली में जाने की ,
बस एक बार वो मुड़ कर जो देख लेती थी,
समझ लेंते थे हम,
कि हमें दौलत मिल गई सारे ज़माने की।।
अशोक सुमन भवानी मंडी (राज.)













