
( ४ )
या देवी सर्वभूतेषु मां कूष्मांडा रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ।।
।। मां कूष्मांडा की वन्दना ।।
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हे मां कुष्मांडा ! तुं ही विश्व उदर भरणी ।
अस्तित्व वहिना सकल सृष्टि, माता अवतरिणी।।
हे ! मां कुष्मांडा…….
ब्रह्मांड रचयिता आदि स्वरूपा जग करणी।।
कुष्मांडा आदिस्वरूपा आकाशगंगा जग में धरिणी
हे ! मां कुष्मांडा……..
जग की बनी नियामिका, सर्व संताप तूं हरणी।।
सूर्य-मंडल के मध्य विराजे, शक्ति तूं अवतरिणी।
हे ! मां कुष्मांडा ……
क्षमता तेरी अपार,सूर्यलोक जो बना आधार।
सूर्य सी देदिप्यमान् कांति,आभा अनुपम अपार।
हे ! मां कुष्मांडा ……….
प्रकाशित हैं दसों दिशाएँ, तेज सघन अपरम्पार।।
ब्रह्मांड के सर्व पदार्थ,जीव जग को मिला आधार।
हे मां कुष्मांडा …….
मुख्य हस्त में कमंडल धारी,वाम हस्त गदा भारी।
कमल-धारिणी,अमृत कलश जग हेतु अवधारी।
हे मां कुष्मांडा…. ….
अष्ट हस्त में सिद्धि-निद्धि की माला सत् कारी।।
मृत्यु-लोक के सभी भोग आनन्द तुझ में समावें।
हे मां कुष्मांडा ……….
हे! मां जो नर तेरी छत्रछाया में तुझ को ध्यावे ।
इस जग के मिटें संताप,तेरे कारण सद् गति पावे
हे ! मां कुष्मांडा ……..
हे ! मां तूं अष्टभुजाधारी, सिंह की करे सवारी।।
तर्जनी सोहे चक्र, तूं है अटल धनुर्धारी ।।
हे मां कुष्मांडा……….
इह-लोक के सभी भोग आनन्द तुझ में समावें।।
हे! मां जो नर तेरी छत्रछाया में तुझ को ध्यावे ।
हे मां कुष्मांडा……
इहलोक के मिटें संताप,तेरे कारण सद् गति पावे।
हे! स्नेही मां भक्त तेरा ‘महेश,’ तेरे गुण गावे ।।
हे मां कुष्मांडा……..
महेश शर्मा-करनाल













