
नवदुर्गा के नौ दिन बीत गये अब
आ गया परम पवित्र त्योहार आज,
देवी माँ की विजय मनायी जाएगी,
दुर्गा पूजा बाद दशहरा को आज।
विजया दशमी अर्थात दशहरा,
अति पावन है यह पर्व मनाना,
जिसका अर्थ है अपने अंदर के
दस दुष्कर्मो को स्वयं हराना।
अहंकार, अमानुषता, अन्याय, क्रोध
लोभ, मोह, मद, औरों को दुख देना,
ईर्ष्या और स्वार्थ यही दस दुर्गुण हैं,
दशहरा इन दसों पर विजयी होना।
दस दुर्गुण दस व्यसन मिटें
जब तभी दशहरा होता है,
मन से मनमीत मिले कोई,
तभी सद्भाव भरा होता है ।
जब एक दूसरे को समझ
सकें तभी बात कर पाते हैं,
साथ साथ हँसते मुसुकाते,
हम तभी सुखी रह पाते हैं।
हाथ जोड़ जब गले मिलें,
एहसास साथ का दे पाते हैं,
सच्चे मित्र वही होते हैं जो
सच्चा साथ निभा पाते हैं।
सखा, सहोदर, नाते, रिश्ते
सब के मतभेद मिट जाते हैं,
आदित्य दशहरा तब होता,
भरत को राम मिल जाते हैं।
डॉ कर्नल आदि शंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ













