
कभी आँगन में तितलियों ,
के पीछे भागा करता था बचपन।
अब मोबाइल की स्क्रीन,
में खो गया है बचपन।
मिट्टी के घरौंदों में सपनों का संसार सजाता था,
अब उँगलियों के इशारों पर आभासी दुनिया बनाता है।
न कंचों की खनक है,
न गलियों में शोर है।
मोबाइल की चमक में ,
बचपन कहीं खो गया है।
माँ की लोरी पास है,
पर कानों में ईयरफोन है।
पापा सामने बैठे हैं,
फिर भी संवाद मौन है।
दादी की कहानियाँ अब किस्से पुरानें लगती हैं,
स्क्रीन की रंगीन दुनिया ही अपनी लगती है।
तकनीक ने सुविधाएँ दीं, इसमें कोई इनकार नहीं।
पर बचपन छीन ले,
ऐसा विकास स्वीकार नहीं।
डॉ रुपाली गर्ग
मुंबई महाराष्ट्र













