
कार्तिकेय की माता हैं ये,
सिंह सवारी करती हैं।
कमलासन विराजती माता,
चार भुजाएँ धरती हैं।।
देवी पद्मासना कहाती,
द्वि-भुज कमल, एक स्कंद।
चौथा हाथ वरद मुद्रा का,
दें अशीष, भर उर आनन्द।।
भक्तन उर सुख-शान्ति प्रदायिनि,
सुख-सन्तान, ग्यान देती।
“ऊँ ऐं ह्रीं क्लीं स्कंदमाता,
नमो नम:” से करु विनती।।
तारक असुर दैत्य राजा था,
था उसको वरदान महा।
शिव-गौरी सुत से वध होगा,
बड़ी समस्या, मचा हाहा।।
गौरी जन्मी शिवहित तप कर,
कर विवाह कैलाश रहीं।
हुआ पुत्र स्कंद कार्तिकेय,
मारा दैत्य, हुई सुखी मही।।
रचनाकार-
जुगल किशोर त्रिपाठी (बुन्देलखण्ड के प्रसिद्ध साहित्यकार)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)













