
मैं जंतर-मंतर हूँ…
दिल्ली के शोरगुल भरे सीने पर चुपचाप खड़ा एक गवाह, समय की चाल को नापने के लिए बनी
इन पत्थर की संरचनाओं के बीच,
मैंने समय को गुजरते नहीं, इंसान को बदलते देखा है। सत्ताओं को आते-जाते, वायदों को जन्म लेते और दम तोड़ते,
उम्मीदों को बार-बार टूटकर भी अपनी राख से उठते देखा है।
मैंने देखा है कैसे उम्मीदें कदमों में चलकर आती हैं,
कैसे निराशाएँ तख़्तियों पर लिखी जाती हैं,
कैसे आँखों के आँसू नारों की आवाज़ बन जाते हैं,
और कैसे साधारण-से इंसान,
अपने अधिकार के लिए असाधारण साहस जुटा लेते हैं।
मैं गवाह हूँ,
उन चेहरों का जो सुबह घर से यह सोचकर निकले थे
कि शाम तक शायद कोई सुनवाई होगी,
कोई दरवाज़ा खुलेगा, कोई जवाब मिलेगा।
मैंने उनके हाथों में न्याय की अर्ज़ियाँ देखी हैं,
उनके माथे पर तपती धूप,
उनके गलों में सूखती आवाज़ें
और उनके भीतर आख़िरी उम्मीद तक
लड़ते हुए सपने देखे हैं।
मेरी आँखों के सामने कितनी बार
भूख ने शरीर से अधिक व्यवस्था को ललकारा,
कितनी बार मौन बैठे लोगों ने,
अपने मौन से ही पूरा देश बोलने पर विवश कर दिया।
मैंने देखा है—
जब कोई अपने दर्द के साथ यहाँ आता है,
तो वह केवल अपना दुख नहीं लाता;
वह अपने पीछे छूटे परिवार की चिंता,
अपने बच्चों का भविष्य,
और उस व्यवस्था पर बचा हुआ भरोसा भी लाता !
जिससे वह निराश तो है, पर पूरी तरह टूटा नहीं है।
मैंने,
आन्दोलन के दिनों में जनसमूह की उमड़ती उम्मीदें देखीं, नारों में उठता आक्रोश देखा,
और लोगों की आँखों में बदलाव की संभावना को चमकते देखा।
मैंने यह भी देखा कि,
हर आंदोलन अपनी मंज़िल तक नहीं पहुँचता,
हर आवाज़ को उत्तर नहीं मिलता,
हर आँसू इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं होता।
कुछ लोग लौट जाते हैं अपने सवालों को सीने में दबाकर, और कुछ अपने अधूरे संघर्ष को
अगली सुबह की ज़िम्मेदारी बना लेते हैं।
मैं चश्मदीद हूँ—
केवल विरोध का नहीं, उस विश्वास का भी
जो बार-बार टूटकर फिर से खड़ा हो जाता है।
लेकिन अब जब मेरे नाम के साथ जुड़ी,
आंदोलन स्थल की पहचान बदलने की बात होती है,
तो मेरी स्मृतियों में एक अजीब-सी हलचल उठती है।
मैं सोचता हूँ—
जिन कदमों ने मुझे जनता की आवाज़ का प्रतीक बनाया, क्या वे अब किसी और राह पर चलेंगे?
जिन आँखों ने मुझमें अपनी बात कहने की जगह देखी,
क्या उन्हें अब अपनी पीड़ा के लिए एक नया पता खोजना होगा?
मैं किसी निर्णय का पूरा सच नहीं जानता,
न हर व्यवस्था की मजबूरी से अनजान हूँ,
लेकिन इतना अवश्य जानता हूँ—
किसी जगह का खाली हो जाना,
और किसी समस्या का समाप्त हो जाना,
दो अलग-अलग बातें हैं।
मेरे यहाँ सन्नाटा उतर सकता है,
मेरी धरती पर कदम कम हो सकते हैं,
मेरे आसपास की हवा नारों से खाली हो सकती है,
लेकिन जिन कारणों से लोग अपनी आवाज़ उठाने आते थे,
उनका उत्तर केवल रास्ते बदलने से नहीं मिल सकता।
मैंने इतिहास को अपनी आँखों के सामने बनते देखा है, और इतिहास से एक बात समझी है—
सत्ता बदलती है,
सरकारें बदलती हैं,
नियम बदलते हैं,
यहाँ तक कि विरोध के ठिकाने भी बदल जाते हैं;
लेकिन न्याय की आवश्यकता हर युग में जीवित रहती है।
मैं जंतर-मंतर हूँ,
मैंने किसी को विजेता घोषित नहीं किया, किसी को पराजित नहीं माना।
मैंने तो बस उन लोगों को देखा है जो अपनी बात कहने आए थे,
और उन चेहरों को भी जो उनकी आवाज़ सुनने के लिए कुछ पल ठहर गए थे।
आज जब शाम उतरती है, सूरज की अंतिम किरणें,
मेरी पुरानी संरचनाओं पर ठहरती हैं, तो मुझे लगता है मानो समय स्वयं मेरे कंधे पर हाथ रखकर पूछ रहा हों,
“कहो जंतर-मंतर, आज तुम्हारे पास सुनाने के लिए क्या बचा है?”
मैं उससे कहता हूँ—
मेरे पास अब भी एक माँ की प्रतीक्षा बची है,
एक किसान का अधूरा हिसाब,
एक सैनिक का स्वाभिमान,
एक बेटी की न्याय-पुकार, और,
उन अनगिनत लोगों का विश्वास,
जो सब कुछ खोकर भी अपने देश से उम्मीद करना नहीं छोड़ते।
मेरे पास वे आवाज़ें भी बची हैं जो लौटते समय धीमी पड़ गई थीं,
वे प्रश्न भी जिनके उत्तर नहीं मिले, और
वे आँसू भी जो किसी कैमरे में दर्ज नहीं हुए,
किसी समाचार की सुर्ख़ी नहीं बने,
लेकिन किसी मनुष्य के जीवन में हमेशा के लिए उतर गए।
मैं जंतर-मंतर हूँ—
समय का एक मूक दर्शक,
संघर्षों का एक चश्मदीद,
लोकतंत्र की स्मृतियों में दर्ज एक जीवंत सवाल।
मैंने जो देखा, वह केवल अतीत नहीं है;
वह वर्तमान के सामने रखा एक आईना भी है।
और उस आईने में मैं आज भी यही देखना चाहता हूँ— एक ऐसा देश जहाँ सवाल पूछने वाला निर्भय हो,
जहाँ असहमति को सुना जाए,
जहाँ पीड़ा को जगह मिले,
और जहाँ किसी नागरिक को अपनी आवाज़ के लिए अपने ही लोकतंत्र में अकेला न भटकना पड़े।
मैं जंतर-मंतर हूँ !
मैंने बहुत कुछ देखा है, बहुत कुछ सहा है, बहुत कुछ अपनी मिट्टी में सँभाला है।
लेकिन मेरी सबसे बड़ी गवाही न मेरे पत्थर हैं,
न मेरी दीवारें, न मेरे आसपास की सड़कें।
मेरी सबसे बड़ी गवाही वे आवाज़ें हैं जो यहाँ उठीं!
और वे सवाल हैं जो आज भी उत्तर की प्रतीक्षा में हैं।
मैं जंतर-मंतर हूँ—
समय की आँखों में ठहरा एक चश्मदीद इतिहास!
अपनी सबसे गहरी पीड़ा लिए,
मुझे दुख अपने सूने हो जाने का नहीं,
दुख उस दिन का है जब कोई पीड़ित,
अपनी बात कहने से पहले ही यह मान बैठे कि,
उसे सुनने वाला कोई नहीं है।
क्योंकि उस दिन केवल मेरा आँगन सूना नहीं होगा, लोकतंत्र के भीतर एक विश्वास भी सूना हो जाएगा।
और मैं,
अपनी पत्थर की आँखों में एक अनकहा आँसू लिए,
इतिहास के सामने खड़ा रह जाऊँगा।
मैं जंतर मंतर हूं…
दिल्ली के शोरगुल भरे सीने पर,
उसी संसद की ओर देखता, चुपचाप खड़ा एक गवाह !!
विरेन्द्र जैन “माहिर”
नागपुर महाराष्ट्र













