Uncategorized
Trending

ग़ज़ल


रेत पर रेत जमा करती है।
काम ये रोज़ हवा करती है।

धूप या छांह की तरह किस्मत,
साथ जीवन के रहा करती है।

जो न कर पाई दवाएं जितनी,
काम वो एक दुआ करती है।

नेक कर्मों से कमाई नेमत,
आपके साथ वफ़ा करती है।

आंँच दिखती तो है लगी बाहर ,
आग भीतर भी जला करती है।

बोलकर भी जो नहीं कह पाए,
आँख वो बात कहा करती है।

दुश्मनों से तो रहे बच बचकर,
दोस्ती भी तो दग़ा करती है।
नवीन माथुर पंचोली
अमझेरा धार मप्र

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *