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षष्ठम्- कात्यायनी

किया कठिन तप ऋषि कात्यायन,
खुश हो शक्ति सुता बन जन्मी।
नाम पड़ा कात्यायनी उनका,
दुष्टदलन, दु:ख-दारिद दमनी।।

एक हाथ किरपान सुशोभित।
दूजे कर में पुष्प कमल।
वाहन सिंह, चतुर्भुज माता,
दोऊ कर अभय-वरद पल-पल,

आज्ञा चक्र निवास करे ये,
देती हैं चारों पुरुषार्थ।
रोग, भय, संकट हरती,
शहद इन्हें प्रिय, जन लाभार्थ।।

ऊँ देवी कात्यायन्यै,
मन्त्र प्रार्थना का इनका।
चहुँ पुरुषार्थ प्रदायिनि नासै,
सकल रोग, दु:ख तन-मन का।।

रचनाकार-
पं०- जुगल किशोर त्रिपाठी
(प्रसिद्ध साहित्यकार बुन्देलखण्ड)
बम्हौरी, मऊरानीपुर, झाँसी (उ०प्र०)

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