
विधा : पद्य
माटी का तन ,
माटी का दीया ।
माटी से निकलीं ,
जनकपुर सिया ।।
माटिए का तन है ,
माटी ही संसार ।
माटी होत पावन ,
सोच देख एक बार ।।
माटी के तन हेतु ,
उपयोगी ये माटी है ।
जन्म लिया माटी में ,
मृत्यु बाद ये माटी है ।।
माटी तन ज्योत जगाए,
माटी दीया जगमगाए ।
माटी दीया तू जला ले ,
चकाचौंध घमंड दिखाए ।।
माटी तन शोभे माटी ,
जीवन बाद तन माटी ।
माटी धरा माटी जगत ,
माटी बाद धन है माटी ।।
सस्ता धन है यह माटी ,
सस्ते धन महंगे परिपाटी ।
माटी तन हेतु माटी पावन ,
टाटी मड़ई या घर माटी ।।
चकाचौंध में चक्षु जाए ,
जगत शोर बहरा बनाए ।
ईर्ष्या शोषण बनाए पंगु ,
धर्म जगत मूक दिखाए ।।
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।












