(हास्य-व्यंग्य में लिपटी रचना)
कवि जी पहुँचे मंच पे एक दिन,
हाथ में कविता, चेहरे पे गिन-गिन।
कहने लगे — “ये कविता है भारी!”
लोग बोले — “पहले बताओ, स्पॉन्सर की तैयारी?”
अब साहित्य भी चला EMI पे,
चार लाइन लिखो, पोस्ट करो टाइमलाइन पे।
कविता नहीं, अब ‘कंटेंट’ कहाओ,
और हर टुकड़े को टैग लगाओ।
“जनाब, इस शेर में ब्रांड फिट करो,
और उस मिसरे में हैशटैग जड़ दो।
कहानी में थोड़ा मसाला हो जाए,
थोड़ी मोहब्बत, थोड़ा ड्रामा हो जाए!”
प्रकाशक बोले — “हिंदी चलेगी कब तक?
कुछ अंग्रेज़ी छिड़को, वरना रहो चुपचक।
‘Love’, ‘breakup’, ‘pain’ का तड़का लगाओ,
बेस्टसेलर तभी तुम कहलाओ!”
अब कवि बेचारे क्या करते जी,
कलम छोड़, खोल ली चाय की कड़ाही।
बोले — “कम से कम स्वाद बिकता सही,
शब्दों की क़ीमत तो बची ही नहीं!”
डॉ बीएल सैनी
श्रीमाधोपुर सीकर राजस्थान













