
पत्थर की इस दुनिया में, आईना-ए-दिल कहाँ धरूँ?
मुखालिफ हैं हवाएँ सब, उड़ान अपनी कहाँ भरूँ?
चीर कर इन पंखों को, ये बेबसी कहाँ धरूँ?
शख्स ही पत्थर हुआ, तो दास्ताँ कहाँ धरूँ?
धरा दलदल हुई ऐसी, अब जलकुंभी भी नहीं,
सूख गया है वो सहारा, पहली सी ताज़गी भी नहीं।
जहाँ पाँव धरूँ मैं, धँसती जाए ये रूह मेरी,
जमीं बंजर हुई ऐसी कि अब तिश्नगी भी नहीं।
छलती अपनी परछाईं, धूप के इस शहर में,
साथ चलते ये मुकरती, वक़्त के इस कहर में।
मिले न कोना जहाँ, खुद को खुद से मिला सकूँ,
अपने ही ‘नियरे-नियरे’, वो साया कहाँ धरूँ?
रकीब है जमाना यहाँ, हर शख्स एक दीवार है,
किसे सुनाऊँ हाल-ए-दिल, खामोशी ही तलवार है।
टूट कर जो बिखर जाए, वो आरज़ू कहाँ धरूँ?
कांच के इन टुकड़ों को, आखिर मैं कहाँ धरूँ?
मिले न साहिल तो क्या, लहरों से लड़ना ही नियति है,
मगर जहाँ रूह न बचे, वो बंदगी कहाँ धरूँ?
सवालों की इस भीड़ में, जवाब का चेहरा कहाँ धरूँ?
खुद को ढूँढती हुई मैं ‘रजनी’, अपना ठिकाना कहाँ धरूँ?
रजनी कुमारी
लखनऊ उत्तर प्रदेश












