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हम दो, हमारे दो ही तमाम हैं

कितने सुंदर दिन बचपन के,
सब को फुर्सत ही फुर्सत थी,
अब फुर्सत तो ग़ायब हो गयी,
अब सबके पास बहुत काम हैं।

पत्थर मार कर आम गिराते थे,
अब मोबाइल में व्यस्त बहुत हैं,
पुस्तक की सारी जानकारियाँ,
अब गोगल में ही मिल जाती हैं।

गांवों के गलियारे अब सुने हैं,
शहरों की सड़कों पर जाम हैं,
बड़े बुजुर्गों की नहीं जरूरत,
हर इंसान बहुत बुद्धिमान है।

खेत बाग सब उजड़ चुके हैं,
अब गमले बंगलों की शान हैं,
फल, फूल अब बाज़ार से लाते,
सब्जी भाजी का क्या काम है।

दूध, दही, मक्खन की मशीन है,
तो गाय भैंस का क्या काम है,
चिट्ठी लिखना बंद हो गया अब,
ह्वाट्सऐप पर मिलते पैग़ाम हैं।

आदित्य एसी कूलर में रहते हैं,
अब सर्दी व गर्मी से जुकाम हैं,
संयुक्त परिवार नहीं बचे हैं,
हम दो, हमारे दो ही तमाम हैं।

डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’, लखनऊ

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