
सफलता पाने का यह एक उसूल है,
वह सब भूल जाइये जो फ़िज़ूल है,
बढ़ती उम्र में जाने क्या सोच लेते हैं,
दिखावे के लिये अपने को छिपाते हैं।
अपने चेहरे की बढ़ती झुर्रियाँ एवं
सफ़ेद बाल देख, एक उम्र दराज़
शहर के एक बढ़िया से सैलून में गया,
सैलून का चटक बंदा उनके पास आया।
उसने इज़्ज़त से वरिष्ठ का स्वागत किया,
वरिष्ठ जन ने अपनी समस्या उसे बताया,
और पूछा कि इन सफ़ेद बालों के लिये,
इस सैलून में उसके पास कुछ है क्या?
सैलून वाला बंदा हँसकर बोल पड़ा,
अंकल वैसे तो मैं सफ़ेद बालों को
काला या मेहंदी के रंग से रंग दूँगा,
आपकी झुर्रियाँ भी चिकनी कर दूँगा।
पर जब काले रंगे बालों के साथ
आप फिर से सैलून पर आओगे,
तो आपको नहीं पहचान सकूँगा,
मैं तब अंकल नहीं भईया बोलूँगा।
ढलती उमर में बाल तो काले कर लेते हैं,
हम सभी उमर दराज़ न दिखने के लिये,
पर जो इज़्ज़त वरिष्ठ दिखने में मिलती है,
आदित्य उमर छिपाने में कहाँ मिलती है।
डॉ कर्नल आदिशंकर मिश्र
‘आदित्य’, ‘विद्यावाचस्पति’
‘विद्यासागर’ लखनऊ













